जो छिपाए ना बने....
जीवन की पगडंडी पर बटोरे शंख-सीपियों का क्षणभर अवलोकन...
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अब भी याद आए गांव....
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आज़ विरह की रात..
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इतनी भी दीनता ठीक नहीं....
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कहाँ स्लमडॉग हिंदी और कहाँ मिलियनारी अंग्रेजी
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कहीं आपको नेटमानिया तो नहीं...
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बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
जीवन
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सुख एक सुनहला पंछी
ख्वाव उनींदी आंखों का
तृष्णा अतृप्त कंठों की......
कंटकित राह, अथाह चाह,
उस समग्र की
बूंद भर प्यास
क्षण भर आस
भर लेने को अथाह
सागर की वासना
लहूसिक्त चेहेरों पर ढांकें मुखोटे
छुपाये गरल
अदृश्य रगों में......।
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