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बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

पेतेन


पेतेन

आठ दस घरों वाले गांव में वारिश में और झंझड में अधढहा मकान जिसकी एक भीत पर बुढ़िया के हाथ से बने गेरू के चित्र अभी भी साफ़ है । तेरह साल पहले बुढ़िया के बड़े बेटे की इसी घर के पास के पीपल के नीचे बिज़ली गिरने से मौत हो गई । रो दहाड़ की चुप्पी के बाद इस परिवार ने यह मकान छोड़ दिया और गांव के उस सिरे पर बांस के झुटपुटे के पार पुआल की झोपड़ी बना ली थी । दो साल पहले बेटी के गौने के बाद बुढे ने ऐसी खाट पकड़ी कि फिर मौत ने ही आकर आराम दिया । एक छोटा बेटा चारु था जो भूख-गरीबी के इस नरक में सड़ना नहीं चाहता था सो वह भट्टे में ईंट सेंक कर जठर की आग बुझाने दक्षिण चला गया । परिवार के नाम पर अब अकेली बुढ़िया बची है गांव में । टुकड़े भर जमीन पर शाक-भाज़ी बोकर बुढ़िया अपने बचे दिन काट रही है । बुढ़िया के दिनों-दिन बुढ़ाते-झुर्राते चेहरे और अक्सर झोपड़ी में पड़े रहने की आदत कारण गांववाले भी उसे पेतेन (डायन) समझ कतराते हैं । पोस्टमास्टर कहता है, बुढिया चारू के लौटने के अब लक्षण नहीं, सुना है उधर जोरू कर ली है । गौने से पहले बेटी बुढ़िया से बड़ी हिली थी पर अब उसकी गिरस्ती दूसरी हो गई, फिर भला इस नरक में आकर कौन सड़े ।

भादो की झड़ी लगी है और चार दिन की लगातार वारिश से बुढ़िया की झोपड़ी तीन-चौथाई टपकने लगी है । बदली के अंधेरे में सांझ कब ढली पता नहीं चला । झोपड़ी के एक कोने में देढ़ हाथ की सूखी जमीन पर बुढ़िया ऊकड़ू होकर बैठी है और दूसरे किनारे पर तालपत्री की आड़ में ढिबरी जल रही है धूंए का काज़ल झोपड़ी के पुआल पर जम रहा है । बूढ़ी हड्डियों में इतनी ताकत नहीं कि इस मौसम में इंधन और खाने का कुछ जुगाड़ कर सके । माटी की हांडी में तीन दिन से पड़ा बासी पखाल (पानी में डाला गया भात) भी गंधाने लगा है । नरक में कौन रहता है,

पेतेन के सिवा !!