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बुधवार, 30 मई 2012


इंसान की जिंदगी



Myspace Graphics मैं आज के इंसान की जिंदगी को कुत्ते की पूंछ के समान समझता हूँ जो टेढ़ी रहे तो पूरी मानवता उसकी एक भौंक से डरती है पर सीधी हो जाए तो पागल समझ कर सारी भीड़ उसपर झपटती है| मैं आज के इंसान की जिंदगी को सरकारी स्कूल के ब्लैकबोर्ड के समान समझता हूँ जो जितना काला रहे उतना साफ है और यदि कभी उसपर सफेदी आ जाए तो डस्टर रूपी समाज उस पर चलता है क्यौंकि सफेदी से वो जलता है| मैं आज के इंसान की जिंदगी को क्रिकेट की बॉल के समान समझता हूँ जो अपने नयेपन की चमक से विपक्षी को परेशान करे तो ठीक पर पुरानी होने पर परिजन रूपी क्रिकेटर भी उससे डरते हैं ईश्वर रूपी अंपायर से उसे बदले की अपील करते हैं।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

खोज जारी है....


खोज जारी है....

गूगल अर्थ पर खोज रहा हूँ,
बचपन का वो की विस्मृत गलियाँ
आकाश की नज़र से
देख रहा हूँ कि कहीं कोई
दिख जाए चिरपरिचित पगडंडी
कोई घरौंदा अब भी समय की रेत पर
सलामत हो शायद कहीं......
जीवन के तीव्रता से कटते मोडों पर
गाँव की नदी के मोड पर
बरगद की छाहं बड़ी याद आती है...
फ़ेसबुक पर सर्च करता हूँ
विछड़े दोस्तों के नाम
कि कहीं शायद कोई मुझसा भी तनहा
खोज रहा हो रेत पर सीपियों को यहीं कहीं..
धुंधलाते कॉलेज के दोस्तों के चेहरे
वो चहक, निश्छल ठहाकों से सोंधी शामें
मन स्कैन नहीं कर पाता हूबहू अब उसे

बुढिया के झोंपड़े सा उपेक्षित
अपने कस्बे से दूर यहाँ
बैठा हूँ एकदम अकेले
ओढ़ी हुई मुस्कान लिए
सदभावना और सलीके से
धन दौलत इज्ज़त शोहरत के द्विप में
सर्च इंजनों के जंगल के बीच
उस शै से दूर
लोग जिसे जिंदगी कहते थे कभी.....

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

कितना आज़ तृषित मन मेरा....



दुःख के बादल, सुख की छईंया
चिनगी चिनगी मन की बगिया
प्रियतम तेरे रूप दरश को
कितना आज़ तृषित मन मेरा....

पीली फूलों की क्यारी सा
मेरा मन उमग ही जाता
सांझ दुआरे जब तम लाती
जल जाती तब प्रिय मन बाती
मधुर पीर की रस बूंदों से
कितना आज़ सिंचित मन मेरा....

बीती अनबीती जो मन पर
धूप छांव सी कथा रही वो
मनाकाश पर दुःख की बदली
नैन नीर की व्यथा रही जो
प्रिय तेरे कर नेह किरणों से
कितना आज़ वंचित मन मेरा....

अंतर के महाकाश पर
उर का झिलमिल दूर सितारा
समय गति की निहारिका में
भटक भटक कर यह मन हारा
तृष्णा के अदृश्य रंग में
कितना आज़ रंजित मन मेरा.....

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं....




Myspace Graphics

नीले आकाश पर आज़
कसक की पीली स्याही से
लिख देना चाहता हूं कुछ अनगढ़े शब्द...

ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं....

यह शब्द केवल शब्द नहीं
ध्वनि चिह्न नहीं मात्र
सहस्र सहस्र अश्रुओं से धुले-पुंछे
अनंत उसांसों की ताप से तपे
प्रत्येक कोण इन अक्षरों के
यथार्थ के प्रहारों से कटे-छंटे
समय की अविरल लहरों से
कगार की विदीर्ण शिलाओं से
ये शब्द जीवन के मूक संकेतों की
विजय कथा गढ़ते हैं
ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं.....

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

इतनी भी दीनता ठीक नहीं....


इतनी भी दीनता ठीक नहीं....

इतनी भी दीनता ठीक नहीं
जीवन उपहार है भीख नहीं
बस यही राह है चलने की
ऐसी ही तो कोई लीक नहीं
इतनी भी......(1)

थम जाऊं देख पहाड़ अगर
फिर कैसी राह, फिर कया है डगर
किंतु-परंतु, शायद और यदि
बस यही जीवन की सीख नहीं
इतनी भी......(2)

निज स्वार्थ जहां देखा मन ने
गौरव ने घुटने टेक दिए
बिक गया इमां इंसा का यहां
पर अंतर की कोई चीख नहीं
इतनी भी.....(3)


मुट्ठी भर सांसों की थाती
निजता परता में बिखर गई
धन पे जिए धन पर ही मरे
पर क्षण भर रुकने की दीक नहीं
इतनी भी.....(4)

जीना था जिए कोई हर्ज नहीं
पर राह नई ना गढ़ पाए
हासिल हैं मुकाम कहने को कई
पर शिखर कोई नजदीक नहीं
इतनी भी….(5)

सोमवार, 2 अगस्त 2010


कल नाशिक से गोवा मंगला एक्सप्रेस से लौट रहा था 2nd एसी में रिज़र्ववेशन था मेरे कंपार्टमेंट में दिल्ली के चार-पांच लड़के और एक लड़की बैठी हुई थी मैं ऊपर की सीट पर सोने चला गया लड़के अपने हिसाब से टाईम-पास करने लगे वे दिल्ली के थे और उडूपी में ईंजिनियरिंग पढ़ रहे थे सभी के पास लैपटाप थे और वे उसमें मूवी देखने में व्यस्त थे उनकी बातचीत मेरे कानों में पड़ रही थी उनकी बातचीत में जो मुद्दे रहे थे वो बड़े अचंभित कर देने वाले थे उनकी उम्र मुश्किल से 20-21 साल ही रही होगी पर बातें ब्याय-फ्रेंड,गर्ल-फ्रेंड आदि पर केंद्रित थी उनमें से एक लड़का अपनी क्लास के एक्सपीरिय़ंस बता रहा था वो कहने लगा कि एक बार क्लास में लेक्चरर ने किसी लड़के को डांट दिया इस पर वो लड़का और उसके दोस्त उस लैक्चरर से बहस करने लगे आखिर में लड़का चिढ़कर लैक्चरर से कहा _यु आर गे...!! अब गुरुकुल संस्कृति का हवाला ना भी दें तो आज के छात्र अपने शिक्षक को गे अर्थात समलैंगिक जैसी भद्दी और अपमानजनक गाली देने से नहीं चूक रहे हैं लैपटाप इन बच्चों को पढ़ाई और रिसर्च के नाम पर दिए जाते हैं पर वे लोग इस पर किस प्रकार की मूवियां देख रहे थे यह बताने की जरुरत नहीं उन लड़कों के बगल में उनके दो सिनियर्स अर्थात एक लड़का और लड़की बैठे थे गाड़ी एक स्टेशन पर खड़ी हो गई तो वे दोनों बाहर जाकर सिगरेट फूंकने लगे लड़की सेल पर अपने डैड से बात कर रही थी और इधर अपने व्याय-फ्रेंड के सिगरेट के धूंए से लहांलोट हो रही थी अब यह सोचने का विषय है कि आधुनिकता के नाम पर नई पीढ़ि किस दिशा में जा रही जहां नैतिक मूल्यों की कोई जगह नहीं पूरी शिक्षा व्यवस्था डोनेशन पर आधारित रट्न्तु विद्या पर आधारित है अपने पैसे,अंग्रेज़ी से दूसरों पर रोब झाड़ने वाली पीढ़ि अगर हम पैदा नहीं कर रहे हैं तो ओर क्या कर रहे हैं॥!! लैपटाप पर ब्लु फिल्म देखती, अपने शिक्षको को गे बताती, सिगरेट के धुंएं में भविष्य तलाशती मैकडोनाल्ड छाप इस पीढ़ि का भविष्य तो भगवान ही जाने कि क्या है??