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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013
गुरुवार, 14 जून 2012
Myspace Graphics पटरियां जीवन की गति में क्षण दो क्षण ठहर रेल की पटरियां.... दौड़ती भागती लहराती बल खाती मिलती बिछुड़ती साथ साथ नकारती जड़ता को हमारी आंखोँ के भ्रम से वैसे ही जैसे समय की गति नकारती है जीवन के ठहरावों को ......
बुधवार, 30 मई 2012
इंसान की जिंदगी
Myspace Graphics मैं आज के इंसान की जिंदगी को कुत्ते की पूंछ के समान समझता हूँ जो टेढ़ी रहे तो पूरी मानवता उसकी एक भौंक से डरती है पर सीधी हो जाए तो पागल समझ कर सारी भीड़ उसपर झपटती है| मैं आज के इंसान की जिंदगी को सरकारी स्कूल के ब्लैकबोर्ड के समान समझता हूँ जो जितना काला रहे उतना साफ है और यदि कभी उसपर सफेदी आ जाए तो डस्टर रूपी समाज उस पर चलता है क्यौंकि सफेदी से वो जलता है| मैं आज के इंसान की जिंदगी को क्रिकेट की बॉल के समान समझता हूँ जो अपने नयेपन की चमक से विपक्षी को परेशान करे तो ठीक पर पुरानी होने पर परिजन रूपी क्रिकेटर भी उससे डरते हैं ईश्वर रूपी अंपायर से उसे बदले की अपील करते हैं।
रविवार, 10 अप्रैल 2011
खोज जारी है....

खोज जारी है....
गूगल अर्थ पर खोज रहा हूँ,
बचपन का वो की विस्मृत गलियाँ
आकाश की नज़र से
देख रहा हूँ कि कहीं कोई
दिख जाए चिरपरिचित पगडंडी
कोई घरौंदा अब भी समय की रेत पर
सलामत हो शायद कहीं......
जीवन के तीव्रता से कटते मोडों पर
गाँव की नदी के मोड पर
बरगद की छाहं बड़ी याद आती है...
फ़ेसबुक पर सर्च करता हूँ
विछड़े दोस्तों के नाम
कि कहीं शायद कोई मुझसा भी तनहा
खोज रहा हो रेत पर सीपियों को यहीं कहीं..
धुंधलाते कॉलेज के दोस्तों के चेहरे
वो चहक, निश्छल ठहाकों से सोंधी शामें
मन स्कैन नहीं कर पाता हूबहू अब उसे
बुढिया के झोंपड़े सा उपेक्षित
अपने कस्बे से दूर यहाँ
बैठा हूँ एकदम अकेले
ओढ़ी हुई मुस्कान लिए
सदभावना और सलीके से
धन दौलत इज्ज़त शोहरत के द्विप में
सर्च इंजनों के जंगल के बीच
उस शै से दूर
लोग जिसे जिंदगी कहते थे कभी.....
मंगलवार, 4 जनवरी 2011
कितना आज़ तृषित मन मेरा....

दुःख के बादल, सुख की छईंया
चिनगी चिनगी मन की बगिया
प्रियतम तेरे रूप दरश को
कितना आज़ तृषित मन मेरा....
पीली फूलों की क्यारी सा
मेरा मन उमग ही जाता
सांझ दुआरे जब तम लाती
जल जाती तब प्रिय मन बाती
मधुर पीर की रस बूंदों से
कितना आज़ सिंचित मन मेरा....
बीती अनबीती जो मन पर
धूप छांव सी कथा रही वो
मनाकाश पर दुःख की बदली
नैन नीर की व्यथा रही जो
प्रिय तेरे कर नेह किरणों से
कितना आज़ वंचित मन मेरा....
अंतर के महाकाश पर
उर का झिलमिल दूर सितारा
समय गति की निहारिका में
भटक भटक कर यह मन हारा
तृष्णा के अदृश्य रंग में
कितना आज़ रंजित मन मेरा.....
मंगलवार, 7 दिसंबर 2010
ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं....

Myspace Graphics
नीले आकाश पर आज़
कसक की पीली स्याही से
लिख देना चाहता हूं कुछ अनगढ़े शब्द...
ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं....
यह शब्द केवल शब्द नहीं
ध्वनि चिह्न नहीं मात्र
सहस्र सहस्र अश्रुओं से धुले-पुंछे
अनंत उसांसों की ताप से तपे
प्रत्येक कोण इन अक्षरों के
यथार्थ के प्रहारों से कटे-छंटे
समय की अविरल लहरों से
कगार की विदीर्ण शिलाओं से
ये शब्द जीवन के मूक संकेतों की
विजय कथा गढ़ते हैं
ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं.....
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