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बाद रहज़नी के कुछ यूं सफ़र का समा निकला
फ़िर लूटा के शुकुं जिस्त का कारवां निकला ॥
सिवा कत्ल के कोई न थी रज़ा तेरी मगर
दर्द से ज्यादा हर दर्द का सामां निकला ॥
बिक गया निशात-ए-जि़गर यूं सरे शहर
कुछ इस कदर इस बेकद्र का कद्रदां निकला ॥
लिखते थे दर्द कि वज़ा न हो बेअसर
बहुत बेदर्द मगर मेरा दर्द ख्वां निकला ॥
जब्ज़-ए-जख्म से यूं नशर हुआ ज़िगर
बहुत बदबख्त बशर तेरा दौरे जमां निकला ॥
यूं सर-ए-मकतल तेरा रू बेबयां निकला
बेदिल जुबां निकली, दिल बेबयां निकला ॥
बेबयां इशरत था जीस्त-ए-तनहा का सफ़र
तंग तो बहुत था पर तेरे कूचे से आसां निकला ॥
उलझ गए ये दर्द के पुरज़े दिल में कुछ इस कदर
कि मर्ज से मुश्किल मर्ज का दरमां निकला ॥
दाग-ए-रू धुले अश्कों से तो निखरा है चैहेरा कुछ यूं
बाद बदली के ज्यों खुलकर आसमां निकला ॥
जरा कठिन शब्दों का हिन्दी अनुवाद भी दें, तो बेहतर!
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