हां, अब भी याद आए गांव
कोश सहस्र से लुभाए गावं
वो गरमी की सूनी सड़कें
वो सरदी की अलाव पर कड़कें
बिसरा कैसे जाए गावं
अब भी याद आए गांव..
वो उजली धूप सी खुशियां
वो मित्रों की बतकहियां
चांदी सी निखरी वो नदियां
रह रह टीस उठाए गांव..
अब भी याद आए गांव..
शीर्षक
- अपनी भाषा हिन्दी (1)
- अब भी याद आए गांव.... (1)
- आज़ विरह की रात.. (1)
- इतनी भी दीनता ठीक नहीं.... (1)
- ओ गौरेया..... (1)
- ओम श्री भ्रष्ट्चारय नमः (1)
- कहाँ स्लमडॉग हिंदी और कहाँ मिलियनारी अंग्रेजी (1)
- कहीं आपको नेटमानिया तो नहीं... (1)
- कितना आज़ तृषित मन मेरा.... (1)
- कोई जूते से ना मारे मेरे दिवाने को (1)
- खोज जारी है.... (1)
- गंगाधर मेहेर की दो कविताएँ (1)
- जीवन (1)
- पाकिस्तानी को हाकी क्यों मारी. (1)
- पेतेन (1)
- बबुआ अर्जुन के साथ ओपनिंग करने का इरादा है का ..... (1)
- बहुत बदबख्त बशर तेरा दौरे-जमाँ निकला.... (1)
- माटी (1)
- मियां सचिन (1)
- ये शब्द यूं ही नहीं बनते हैं.... (1)
- हिंदी (1)
- हॉकी और बाघ (1)
- Hindi (1)
हिंदी है जन-जन की भाषा,हिंदी है भारत की आशा
सुस्वागतम
Pages
सोमवार, 19 जुलाई 2010
बुधवार, 10 मार्च 2010
ओम श्री भ्रष्ट्चारय नमः

हरे नीले नोटों पर तुमने दिया वरदान
तुम कुबेर के द्वार हो, तुम रतन धन खान
तुम बिन भारतवर्ष में कहीं न गलती दाल
जय जय भ्रष्टाचार गुरू, जय जय भ्रष्ट कृपाल ॥॥
जय भ्रष्टाचार महा महिमा ।
जय दुर्नीति जय गुण गरिमा ॥
तुम्हरे भजन सरकार को भावे
मंत्री-संतरी सब गुण गावे ॥
घोटाले की तुम हो माता
तुम्हारी माया कोई समझ ना पाता ॥
और-छोर तुम्हारा नहीं जग में
तुम व्यापे हो देश की रग-रग में ॥
भारत देश तुम्हें अति प्यारा
हर कोई तुमसे गया मारा ॥
बोफ़र्स की जो तोप चलाई
डगमग हो गई कांग्रेस आई ॥
लालू यादव दूत तिहारा
निगल गया भेंसों का चारा ॥
तुम्हारी महिमा जो नर गावे
भर भर नोट जेब में जावे ॥
नेता नाम तुम्हे अति प्यारा
अद्भुत ये जीव तुमने उतारा ॥
सुखराम को तुमने वर दिन्हा
मधु कौड़ा ने मधुरस लिन्हा ॥
इनकी करतूत यह जन जाने
यह वायरस बस नोट पहिचाने ॥
घूस रिश्वत कई नाम तिहारे
इनसे मिले कईयों को सहारे ॥
स्विस बैंक हरिद्वार तिहारा
नेता का बैकुंठ यह प्यारा ॥
यहां पहुंच जो नर जाता
सात पुश्त तक मौज मनाता ॥
काला धन यहां जो आता
क्षणभर में गोरा हो जाता ॥
नेता मंत्री तुम सबके रक्षक
दो नंबर के माल के भक्षक ॥
कार्यालय में तुम्हारा डेरा
मंत्रालय में तुम्हारा बसैरा ॥
सचिवालय में तुम्हारा आसन
निर्देशालय में तुम सिद्धासन ॥
कलयुग के तुम सच्चे साधक
कौन यहां तो तुम्हारा बाधक ॥
जब भी किसी ने आवाज़ उठाई
नोट के बल पर मुंह की खाई ॥
जो ईमानदार सामने आता
बेईमानों का जूता खाता ॥
तुम्हरे बल सब संभव हो जाता
तुम हो तो मन नहीं घबराता ॥
पासपोर्ट और राशन-पानी
तुम हो तो न आना-कानी ॥
जब तुम अपना परताप दिखाते
कैसे भी टेंडर पास हो जाते ॥
अफ़सर बाबुओं के तुम तारक
ठेकेदारों के तुम उद्धारक ॥
जो जो तुम्हरे शरण में आता
भिक्षुक भी सम्राट कहलाता ॥
बहुत बदबख्त बशर तेरा दौरे-जमाँ निकला....
.jpg)
बाद रहज़नी के कुछ यूं सफ़र का समा निकला
फ़िर लूटा के शुकुं जिस्त का कारवां निकला ॥
सिवा कत्ल के कोई न थी रज़ा तेरी मगर
दर्द से ज्यादा हर दर्द का सामां निकला ॥
बिक गया निशात-ए-जि़गर यूं सरे शहर
कुछ इस कदर इस बेकद्र का कद्रदां निकला ॥
लिखते थे दर्द कि वज़ा न हो बेअसर
बहुत बेदर्द मगर मेरा दर्द ख्वां निकला ॥
जब्ज़-ए-जख्म से यूं नशर हुआ ज़िगर
बहुत बदबख्त बशर तेरा दौरे जमां निकला ॥
यूं सर-ए-मकतल तेरा रू बेबयां निकला
बेदिल जुबां निकली, दिल बेबयां निकला ॥
बेबयां इशरत था जीस्त-ए-तनहा का सफ़र
तंग तो बहुत था पर तेरे कूचे से आसां निकला ॥
उलझ गए ये दर्द के पुरज़े दिल में कुछ इस कदर
कि मर्ज से मुश्किल मर्ज का दरमां निकला ॥
दाग-ए-रू धुले अश्कों से तो निखरा है चैहेरा कुछ यूं
बाद बदली के ज्यों खुलकर आसमां निकला ॥
सोमवार, 1 मार्च 2010
पाकिस्तानी को हाकी क्यों मारी..

पाकिस्तानी को हाकी क्यों मारी..
लगता है अस्ट्रेलिया की भारत से पिछले जनम की कोई दुश्मनी रही है । पहले क्रिकेट में भारत की बढ़्ती बादशाहत देख कर कंगारुओं को जो मिर्ची लगी वो देखने लायक थी । कभी हरभजन पर चकिंग का आरोप लगा दिया, कभी भारतीय टीम पर नस्लवाद का आरोप लगा कर पिल पड़े । भारतीय क्रिकेट के हर प्रतिभावान खिलाड़ी पर उनके जलकुकड़े खिलाड़ी,अंपायर और रैफ़री की काली नज़र पड़ती रही है । परमाणु सहयोग के क्षेत्र में अस्ट्रेलिया सदा से भारत की राह का रोड़ा बना है । आजकल ये कंगारू अस्ट्रेलिया में पढ़ने गए भारतीय छात्रों पर खिसियायी बिल्लियों की तरह टूट पड़े हैं । इस कड़ी में कल यह देखने के लिए आया कि अस्ट्रेलियन हांकी रैफरी को भारत की पाकिस्तान पर शानदार जीत से बेचैन कर देने वाली बदहजमी पैदा हो गई । भारत की इस जीत को जब वो किसी दम पचा ना पाया तो भारतीय स्ट्राईकर शिवेन्द्र सिंह पर तीन मैंचों का प्रतिबंध ठोक दिया । शिवेन्द्र का गुनाह यह था कि ड्रिवलिंग के दौरान उनकी हाकी पाकिस्तानी खिलाड़ी की नाक को चूम लिया । कोई अंधा भी इसका रिप्ले देखकर बता सकता है कि शिवेंद्र का इरादा साथी खिलाड़ी को घायल करना कतई न था और वो घायल हुआ भी नहीं । पर गोरी चमड़ी के रैफ़री को इससे क्या मतलब ...!! उसे तो बस भारत की खेल-शक्ति को कुंद करने का जुगाड़ भिड़ाना था सो उसने भिड़ा लिया ।
अब भारतीय हाकी संघ और भारत सरकार को इस मामले सीधे हस्तक्षेप करते हुए इस अन्याय का उपचार करना चाहिए । यह एक खिलाड़ी ही नहीं पूरी टीम के लबालब आत्मविश्वास को तोड़ने की धिनोनी साज़िश है । अन्याय चाहे छोटा हो बडा होता तो अन्याय ही है । अगर इसका पुरजोर विरोध नहीं किया गया तो इन गोरे शेतानों का होसला ओर बढ़ेगा ।
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
मियां सचिन, बबुआ अर्जुन के साथ ओपनिंग करने का इरादा है का .....

मियां सचिन, बबुआ अर्जुन के साथ ओपनिंग करने का इरादा है का .....
मियां सचिन अब बहुत हुआ भईए, अब बहुत हुआ...अब बस भी करो यार । सारा क्रिकेट खुद खा जाओगे या आनेवाली पीढ़ि के लिए भी कुछ छोडोगे । अब अगर बेटे अर्जुन के साथ ओपनिंग करने का इरादा हो तो अलग बोल दो । भई हर चीज़ की एक हद होती है । सारी हदें लाघं जाना ठीक नहीं । सारे रिकार्ड तोडे़ जा रहे हो कांच की बोतल से । बददुआ देंगे बददुआ आने बाले किरकेटिया छोकरे...यही कहेंगें कि सारे रिकार्ड खुद तोड़ गया मास्टरवा और खुद रिकार्डो़ का ऐसे उंचे उंचे खूंटे गाड़ गया आंख दुखने लगे निहारते उन्हें....तोड़ना तो सस्रुरा हमरा बाप भी ना सोच सके । महाराज सचिनचंद जी, अब आप प्रात: स्मरणीय और सांयं बंदनीय हो चुके हो, अब कृपा करो रननिधान, शतकों की खान । सोचो मियां, सुनील, कपिल जैसे महारथी आपके पैर छुने की बात कर रहें..शोभा देता है ऐसे बुजुर्गों से अपने सजदे करवाना । मियां, खुशियां उतनी ही बांटो जितने इस मुल्क के बड़े-बुजुर्गों का दिल संभाल सके । कोई टपक ना जाए किसी अनधिकृत खुशी से भौंचक हो कर ।
हे सचिन महाराज, अब जरा अपने गदा रुपी बल्ले को आराम दो तो दुनिया के गेंदबाजों को कुछ शुकुन नसीब हो । अनवर ने अपनी हेकड़ी ठोकी थी..सचिन चाहे कितने शतक ठोक ले पर मेरे 196 को तोड़ नहीं सकता..। अब जनाब आप कितने के मुंह पर पलस्तर चढाओगे । तुम जम्बुद्वीप रत्न हो, तुम भारत रत्न हो, तुम हिंदुस्तान रत्न हो और तुम्ही इंडिया का कोहेनूर हो...।
शत कोटी भारतियों का सहस्त्र साष्टांग प्रणाम स्वीकार करो ।
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
कहीं आपको नेटमानिया तो नहीं...
.jpg)
कहीं आपको नेटमानिया तो नहीं...
भारत जैसे देश में नेट का प्रयोग अभी विकासशील अवस्था में है फिर भी देश में ऐसे लोगों की तादात बढती जा रही है जिन्हें नेट की लत ने एक नशे का आदि सा बना दिया है । चौंकिए मत यह कोई आम बीमारी तो नहीं पर नेट का निरंतर उपयोग करनेवालों में यह बीमारी अब घर करने लगी है । तो आईए जरा खुद को भी इसके लक्षणों की कसौटी पर परख लें ।
निरंतर कंप्युटर से चिपके रहना, घंटो मित्रों की मेल का इंतजार करना और हर मेल को फारवर्ड़ करना, सर्च इंजनों की बिना बज़ह खाक छानना, सोशल साईट्स पर दिन भर चिपके रहना, चैटिं में अपना समय खराब करना और अगर कभी नेट कनेक्शन आदि में कोई दिक्कत आ जाए तो दिन भर डिप्रेशन या गुमसुम सा रहना, यह सब इसके लक्षण हैं । टी.वी के बाद अब कंप्युटर हमारी व्यक्तिगत ज़िंदगी पर हावी होता जा रहा है और इसका अभाव हमें नशे की अनुपलब्धता सी बैचेनी का एहसास कराता है । इस पर विकसित देशों में अनेक शोध हो चुके हैं और उनमें यह तथ्य सामने आया है कि नेट की अतिनिर्भरता भी मनुष्य को शराब या अन्य मादक पदार्थ सा व्यसनी बना सकती है । जिससे अवसाद, निराशा, अतिकाल्पनिकता, जैसे लक्षण उभर कर सामने आते हैं । पिछले दिनों यह भी एक खबर आई थी कि वर्चुअलवर्ल्ड नामक साईट पर एक जनाब ने किसी आभासी प्रेमिका से ऐसा वर्चुअल चक्कर चलाया कि परिणाम में रियल वाईफ से हाथ धोना पड़ा ।
अत: नेट का प्रयोग तो अतिआवश्यक और आधुनिक बनाता है परंतु इसका प्रयोग जरा संभल कर करें । इसे अपने वास्तविक जीवन पर हावी ना होनें दें । सप्ताह में एक-आध दिन नेट से दूर ही रहें । वर्ना नेटीजेन बनने का चक्कर कहीं आपकी खुशहाल जीवन पर ही असर ना डालना शुरु कर दे । हेप्पी ब्राउसिंग....
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
हिंदी, हॉकी और बाघ

हिंदी, हॉकी और बाघ
यह शीर्षक पढ़ कर आपके मन में एक भाषा, खेल और जीव को एक जगह इकट्ठा करने तुक पर सवाल उठेगा ही...!!! जरा गौर करें, इन तीनों के आगे हम बड़े शान से ‘राष्ट्रीय’ का उपसर्ग लगाते हैं और क्रमश राष्ट्र की वाणी, राष्ट्र का खेल परंपरा की विरासत और भारतीय बनों की शान के रूप में पेश कर गौरवान्वित होते रहे हैं । पर आज़ की तारीख में हिंदी पर अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद, हॉकीपर क्रिकेट के एकछत्रवाद और बाघों पर पैसे की रायफल से हर किसी को चुप करा देनेवाले घाघों ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है । जरा ओर गहराई में जाएं तो पाएंगें कि जब राष्ट्र की अस्मिता से ज़ुड़े होने के बावजूद इनकी हत्या बड़ी खामोशी से राष्ट्र के कर्ता-धर्ताओं के नाक के नीचे की जा रही है । यह हम भारतीयों की पुरानी आदत रही है कि हमारी कुंभकर्णी नींद पानी सर से गुज़रने के बाद खुलती है और वो भी कुछ समय के लिए । उस जागरण में भी कोई सजगता और सार्थक प्रयास कम तथा अफ़रा-तफरी, आरोप-प्रत्यारोप तथा हो-हल्लाहट ज्यादा होता है । हिंदी के भविष्य को लेकर चैन की बंशी बज़ाने वाले भूल रहे हैं कि धीरे धीरे ही सही इस भाषा का क्षरण कर अंग्रेज़ी को स्थापित करने की मुहिम चल रही है । और इसे अंजाम देने बाले ब्रितानी या अमरीकी नहीं हम भारतीय खुद हैं । मीड़िया में हिंदी की स्थिति को देखकर खुश होनेवाले ध्यान दें की आज़ का अधिकत्तर हिंदी मीडिया हिंदी नहीं बल्कि हिंग्लिश मीडिया है । और हिंदी में अंग्रेजी की बेतुकी घालमेल अपनी सभी सीमाएं लांघकर एक ऐसी दोगली भाषा का निर्माण कर रहा है जिसमें ना हिंदी की आत्मा का कोई अंश है और ना हिंदी का कोई संस्कार । आधुनिकता के नाम पर इस भाषा का प्रयोग करनेवाले युवाओं को एक विदेशी भाषा को ठीक से ना समझ पाने और अपनी भाषा की शुद्धता के लिए शर्म महसूस करने की विवशता ने एक वाक्य बोलने में दस बार हकलाने और कंधे उचकाते हुए सड़ज-मुहल्ले में आप देख सकते हैं । यह है भाषा और संस्कारों के पतन और नकलखोरी और आत्महीनता की ग्रंथि से उत्पन्न हकलाट और हिचकिचाहट । कोई भी समाचार, विज्ञापन या फिल्म आप देख लीजिए इसमें आपको अंग्रेज़ी की ताबड़तोड़ घुसपैठ से पैदा हुई बेमेल खिचड़ी ही मिलेगी । फिल्म के नाम देखिए__जब वी मेट, व्हाट इज व्योर राशी.....विज्ञापनों की पंचलाईन देखिए__चार बजे़वाली हंगर का सालिड सोल्युशन...फोन रिसायकल करो बनो प्लेनेट के रखवाले...और भी ना जाने क्या क्या..!! आज़ हमे यह सब अटपटा इसलिए नहीं लगता क्योंकि एक प्रक्रिया के तहत आहिस्ता आहिस्ता यह दोगली भाषाई कचरा हमारे मनोमस्तिष्क में उतारा जा रहा है । एक दिन था जब माधुरी के गाने चोली के पीछे क्या है पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी पर धीरे धीरे हमारे मस्तिष्क ने यह सब पचाना शुरु कर दिया और अब हम विपाशा और हासमी की लगभग ब्लू फिल्म भी सपरिवार पचा रहे हैं । सरकार मीड़िया पर अनियंत्रण की पंगु नीति बना मुहं सीले बैठी है । इससे हमारी आनेवाली पीढि किस प्रकार सांस्कृतिक रूप से दिवालिया और दिग्भ्रमित पैदा होगी इसकी किसे फिक्र है । नियो जैसे क्रिकेट चैनल भी पूरी तरह अंग्रेज़ी और अंग्रेजियत परोसने की नीति बनाकर चल रहें हैं । जब 90% लोग अंग्रेज़ी समझ नहीं पाते तो यह स्पोर्टस चैनल क्यों भारतीय जनमानस में अंग्रेज़ी उंडेलना चाहते हैं, यह समझ से परे है । सराकार हिंदी और अन्य स्थानीय भाषाओं के प्रति सदा से उदासीन रही है ।
एक लोकप्रिय खेल के रूप में क्रिकेट अपनी जगह ठीक था पर इसकी लोकप्रियता पर जब कार्पोरेट की नज़र पड़ी तो यह एक व्यापार, एक धंधा बन गया है । आई.पी.एल. आदि ने खिलाडियों को हाट में बिकनेवाली भेड़-बकरी बना दिया । इस खेल के सितारे तो करोड़ो से खेलते हैं पर हॉकी के खिलाड़ी अपनी मैचफीस तक के लिए तरसते हैं । क्रिकेट का संभ्रांती मठ बना बीसीसीआई जिसके पास आज़ अरबों रुपये हैं क्यों हॉकीऔर अन्य भारतीय खेलो के उत्थान के लिए आगे नहीं आती । हॉकी जीये या मरे इनसे इन्हें क्या लेना-देना, इनका बटुआ गर्म होता रहे, बस यही काफी है । सरकारी निक्कमापन और बाज़ारबाद ने हॉकी का भयंकर पतन कर दिया है । हर जगह विदेशी के अनन्य मोह ने खेलों को भी नहीं वक्शा और प्राचीन भारतीय खेल इतिहास की गर्त में समा गए ।
बाघों के लिए विलुप्ति शब्द लगा कर अपनी भारी भूल और लापरवाही को छिपाना निर्लज्जता के सिवा ओर क्या है । विलुप्त तो वे होते हैं जो अपने परिवेश से अनुकुलित ना होकर मिट जाते हैं । यहां तो पूरी बाघ प्रजाती की हत्या कर दी गई और सरकार विकलांग बन कर देखती रही । पहले राजा-महाराजाओं नें अपने ओछे मनोरंजन के लिए इन्हें मारा फिर अंग्रेज़ों ने इन्हें अपनी हिंसक वृत्ति का शिकार बनाया और अब देश के अंदर देश के ही हत्यारों ने अपनी दौलत की बेचेन भूख को मिटाने के लिए इनका सफाया करने में कोई कोर-कसर ना छोड़ी । चीन और अन्य देशों में बाघ की चमड़ी,हड्डी और अन्य अंगों की सोने सी मांग ने बाघों को दिन-व-दिन कुत्ते की मौत मरने को मजबूर कर दिया । कान्हा आदि अभयारण्यों में हमनें चोरी-छिपे चलने वाला यह कत्लेआम कुछ समय पहले छोटे परदे पर देखा । बाघों के बाद अब मोर, हाथी,चीता भी एक एक कर विलुप्त हो जाएंगे और हमारी सरकार ९% की विकासदर को चूमती चाटती रह जाएगी । जंगल ज़मीन और जनता जिये या मरे, इनका वज़ूद रहे या खत्म हो इसकी किसे फिक्र है ।
जो घट रहा वो इतना बुरा नहीं बल्कि बुरा तो यह है हमारा और आपका घातक चुप्पी साधकर तमाशाबीन बन जाना । आईए हम भी इस नकारातंत्र का हिस्सा ना बने, अपने बच्चों को चोतरफा हो रहे सांस्कृतिक हमले से बचाएं, उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति और अपनी विरासत से रु-ब-रू करवाएं । आईए, हिंदी को बचाएं, आईए हॉकी को बचाएं, आईए अपने राष्ट्रीय पशु को मानवीय पशुता से बचाएं ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)