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बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

अनबीता अतीत


अनबीता अतीत

अर्से बाद तुम्हारा
भोर के ख्वाव में आना
बदली भरी सुबह को
गुमसुम कर देता है

जानी-पहचानी वही तुम्हारी मुस्कान
अनमनी सी आंखों से
तिरछी तिरछी हंसी तुम्हारी
जो समेटी थी कोई अनकही पीर

वर्षों से रूखी बंजर जमीं पर
हल्की बरसात के बाद की उमस
उनींदी उनींदी सी शाम,
स्मृति मात्र नहीं
बीते-अनबीते अतीत का एहसास
समय की विलुप्त पगडंडी पर....
जैसे जंगली फूलों की गंधवाली हवा
जैसे भरी दोपहरी सुनसान रास्ते में किसी चिड़िया की बोल
किसी निशब्द ठिठके क्षण में
जब समय भी ठहरा हुआ सा लगता है
मन के मुहाने पर
स्मृति के बीहड़-बीराने में
किसी अंधे दुभाषिए की तरह
जीवन के संत्रास की मूकभाषा को
भ्रम के झाड़-झंकड़ में दबे-छिपे
मील के पत्थरों में
अज्ञात लिपिचिह्नों में
लिप्यांतरित करता चलता हूं......

अनुभूति के स्वर और
अवसाद की मीलों मोटी
बर्फ की तह के नीचे
किसी अदृश्य सूक्ष्मजीवी सा संज्ञाहीन मन
अनंत कल्पों से किसी उष्म रश्मि
की चिर प्रतीक्षा में......

1 टिप्पणी:

  1. अंधे दुभाषिए की तरह... bahero ko sambhasan...
    aur mook se uttar ki apekxa...
    yahi vidambnay... jeevan... ko...
    satat jilati hai

    bahhot khoob....

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