
आज़ विरह की रात..
आज़ विरह की रात
मिलन की बात ना करना
आज़ विरह की रात.....
पी मधुर गरल की प्याली
जी भर रोई मतवाली
ले सुबह उषा की लाली
नयन, पलक के साथ
शयन की बात ना करना
आज़ विरह की रात....
तरस तरस सब बुझ गईं प्यासें
बरस गईं नज़रों की आसें
नीरस मन की आह उसासें
जीवन की सौगात
थकन की बात ना करना
आज़ विरह की रात....
उर-पीड़ा का बोझ संभाले
ये शोणित के गीत निराले
बड़े नेह से अंतर पाले
ज्यों नीर-नैन का साथ
चुभन की बात ना करना
आज़ विरह की रात.....
यही कथा है यही कहानी
ये मन उन्मन की मनमानी
पीर पराई, व्यथा विरानी
कोई बांचे किसके साथ
सहन की बात ना करना
आज़ विरह की रात....
आंसू का लहराता सागर
भरा भरा ये मन का गागर
सब खोया यूं किसको पाकर
रे पथिक परिजात
जलन की बात ना करना
आज़ विरह की रात
मिलन की बात ना करना
आज़ विरह की रात.....
अमा निशा सम तम मन में
आशा का तुम दीप ना धरना
बुझे-बुझे नीरस प्राणों में
जीवन रस संचार ना करना
आज़ विरह की चिर-बेला में
पुन:मिलन के गीत ना रचना ।
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